Sunday, February 07, 2010

Ibn Batuta by SD Saxena.... A poetry revisited

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में


कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।

3 comments:

Saurabh Dwivedy said...

waah...sundar hai

shadkam77 said...

nice to see this kavita by sarveshwar ji :) ...

Pondering Vagabond said...

:-)