Friday, May 01, 2009

माँ.....

My Friend writes this poem... remembering her mother...

माँ.....
इसी गगन के किसी फलक से झांकती तो हो,
पर नज़र क्यूँ नहीं आती कभी?
पूरा संसार है आज मेरा कहने को,
पर हर सांस कुछ अधूरी सी है कहीं.
याद करती हूँ तुम्हें तो छलछलाती है आँखें,
मद्धम मद्धम गत होती हैं यह नसें.
चेहरे तो कई आये इस दिल को संभालने,
पर पाया उनमें तुम्हें कभी.
गौर किया तो हर रिश्ता निकला सौदे का,
लेना-देना से उबार पाए हम अब भी.
चाहे उम्मीदों का हो सौदा, हो सौदा प्यार का,
भूल रही हूँ खुद को, इन सब में कहीं.
ढूंढती हूँ तुम्हें हर तरफ, हर शक्ल में,
थक गयी दुनियादारी समझदारी निभाने में.
इच्छा है एक बार फिर तुझी से जन जाऊं,
माँ! तेरी गोद में सदा के लिए सो जाऊं.

- तुम्हारी टिम्पू

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